भाग 3: पूजा विधि और व्रत के नियम
क) तैयारी और घटस्थापना:*
नवरात्रि शुरू होने से एक दिन पहले घर की पूरी सफाई की जाती है। पूजा स्थान को गंगाजल से पवित्र किया जाता है। पहले दिन शुभ मुहूर्त में घटस्थापना की जाती है। एक मिट्टी के बर्तन में जौ बोए जाते हैं। एक कलश में जल, गंगाजल, सिक्का, सुपारी, अक्षत डाली जाती है। कलश के मुख पर आम के 5 पत्ते लगाए जाते हैं और उसके ऊपर नारियल रखा जाता है। कलश को लाल कपड़े से लपेटा जाता है और जौ वाले बर्तन के बीच में रखा जाता है। फिर माँ दुर्गा की मूर्ति स्थापित की जाती है और अखंड ज्योत जलाई जाती है जो 9 दिन तक जलती रहती है।
*ख) 9 दिन की दैनिक पूजा:*
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। माँ को लाल फूल, चुनरी, सिंदूर, मेहंदी, फल, मिठाई अर्पित करें। दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा और आरती पढ़ें। शाम को भी दीप जलाकर आरती करें। कई लोग इस दौरान दुर्गा सप्तशती का पूरा पाठ करते हैं।
*ग) व्रत के नियम:*
कई लोग 9 दिन फलाहार व्रत रखते हैं। व्रत में सेंधा नमक, कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा, फल, दूध, आलू खाया जाता है। लहसुन, प्याज, मांस, शराब पूरी तरह वर्जित है। मन, वचन और कर्म से पवित्रता रखी जाती है। झूठ बोलना, किसी का अपमान करना और लड़ाई-झगड़ा करने से बचना चाहिए।
*घ) कन्या पूजन (कंजक):*
अष्टमी या नवमी को 9 छोटी कन्याओं (2 से 10 साल की) को माँ के 9 रूप मानकर बुलाया जाता है। उनके पैर धोए जाते हैं, टीका लगाया जाता है, चुनरी उढ़ाई जाती है और हलवा, पूरी, चने का प्रसाद खिलाया जाता है। साथ में एक छोटे बालक को भैरव रूप में बिठाया जाता है। दक्षिणा देकर उनसे आशीर्वाद लिया जाता है। यह नारी शक्ति के सम्मान का सबसे बड़ा प्रतीक है।
*ङ) हवन और विसर्जन:*
नवमी के दिन हवन किया जाता है। हवन में आम की लकड़ी, जौ, तिल, घी, शहद, कपूर से आहुति दी जाती है। इससे वातावरण शुद्ध होता है। अंत में क्षमा प्रार्थना करके पूजा समाप्त
की जाती है।